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Tuesday, October 14, 2025

आहिस्ता-अहिस्ता***नरेन्द्र चावला

            आहिस्ता आहिस्ता 

आहिस्ता-अहिस्ता चली जा रही है-ये ज़िंदगी की रेल !

पग-पग पर खिलाती व दिखाती रहती अनोखे खेल !!

कभी-कभी आ जाता है , इस सफर में ऐसा जंक्शन !

जहां पर खूब होता रहता है हमारा असीमित मनोरंजन !!

उस समय बनने लगते हैं हमारे साथ प्यारे जिगरी रिश्ते !

मगर अचानक एक दिन सब उड़ जाते,बनकर फ़रिश्ते !!

छा जाती सब मधुरिम यादें बनकर,घनघोर काली घटाएं !

आहिस्ता-आहिस्ता बदलती जाती वक़्त के संग, वक्त की फिजाएं और खिज़ाएं !!

कितना भरा हुआ था गम और ख़ुशी से ये ज़िंदगी का सफर !

प्रभु ने बनाये ऐसे प्यारे रिश्ते,कोई न जाने  उतरना पड़े कहां किधर !!

अब जाना कि इस ज़िंदगी के ही रूप हैं-पतझड़ और बहार ! 

नरेन्द्र चावला कहे,सत्कर्मों से ही सब का होगा सुखी परिवार !!

***नरेन्द्र चावला-वर्जीनिया-अमेरिका*** 

 

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