आहिस्ता आहिस्ता
आहिस्ता-अहिस्ता चली जा रही है-ये ज़िंदगी की रेल !
पग-पग पर खिलाती व दिखाती रहती अनोखे खेल !!
कभी-कभी आ जाता है , इस सफर में ऐसा जंक्शन !
जहां पर खूब होता रहता है हमारा असीमित मनोरंजन !!
उस समय बनने लगते हैं हमारे साथ प्यारे जिगरी रिश्ते !
मगर अचानक एक दिन सब उड़ जाते,बनकर फ़रिश्ते !!
छा जाती सब मधुरिम यादें बनकर,घनघोर काली घटाएं !
आहिस्ता-आहिस्ता बदलती जाती वक़्त के संग, वक्त की फिजाएं और खिज़ाएं !!
कितना भरा हुआ था गम और ख़ुशी से ये ज़िंदगी का सफर !
प्रभु ने बनाये ऐसे प्यारे रिश्ते,कोई न जाने उतरना पड़े कहां किधर !!
अब जाना कि इस ज़िंदगी के ही रूप हैं-पतझड़ और बहार !
नरेन्द्र चावला कहे,सत्कर्मों से ही सब का होगा सुखी परिवार !!
***नरेन्द्र चावला-वर्जीनिया-अमेरिका***
No comments:
Post a Comment