इक दिन लुप्त हो जाएगा आहिस्ता आहिस्ता
धीरे-धीरे किताबों,पत्रिकाओं के प्रकाशन के बंद हो रहे द्वार !
"सरिता,मुक्ता,नंदन,चम्पक,लोटपोट,चाचा चौधरी"ढूंढोगे बार-बार !!
कम्प्यूटर शिक्षा को पुस्तकों के पठन-पाठन बदलने से होरहा फायदा !
मगर हमें तो याद आ रहा वो "अ"अनार,"क" कबूतर वाला कायदा !!
पिछले पन्ने पर होती थी "दो बिल्लियों व बंदर"वाली शिक्षाप्रद कहानी !
गिनती,पहाड़े,मुहावरे,दोहे-चौपाईयां ,कवितायेँ याद होती थी ज़ुबानी !!
Physics,Chemistry, Arithmetic के फार्मूले व संस्कृत के रूप !
खेल-खेल में रट लेते थे मज़े से ,पेड़ों की छाँव हो या कड़कती धूप !!
तख्ती पोतकर सुखाना फिर उस पे कलम से लिखने की क्या थी बात !
सलेट-सलेटी ,बस्ता और हाथों में राज-रोशनाई वाली होती थी दवात !!
नतीजा आने पर ख़ुशी-ख़ुशी नयी खरीदते व बेच देते थे पुरानी किताब !
नफरत बिल्क़ुल नहीं थी गरीब-अमीर में ,खुशियों के खिलते थे गुलाब !!
इस तरह एक ही किताब को हर साल हर बच्चा ख़ुशी से पढ़ता था !
स्कूल का काम न करने पर हाथो पे डंडे या मुर्गा बनना पड़ता था !
किताबों में मोरपंख ,फूल,सांप की केचुल रखने से ज्ञान बढ़ता था !!
अब ज्ञात हुआ है कि वो कान खींचना मस्तिष्क हेतु था लाभदायक !
उस ज़माने के पढ़े-लिखे लोग आज भी माने जाते हैं कितने लायक !!
नरेन्द्र चावला कहे गीताप्रेस तथा पुस्तकें व पुस्तकालयों को बचाइये !
वेद-पुराण,उपनिषद,गीता,मानस भारतीय सांस्कृतिक ग्रन्थ पढाईये !!
वर्ना ये प्राचीन संस्कृति हो जाएगी लुप्त आहिस्ता,आहिस्ता।
पछताओगे जब सब कुछ उड़ जाएगा बन कर फरिश्ता।।
***नरेन्द्र चावला-वर्जीनिया-अमेरिका***
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