किंकर्त्तव्यविमूढ़ / दुविधा ( Dilemma )
( सफलता की ऊंचाईयां )
For 4th August 23 PLG Sr. Citizen
यदि मानव जीवन में पग,पग पर समस्याएं बनकर आती हैं दुविधा। यदि धैर्य तथा शांतिपूर्वक करें सामना,तो बन सकती हैं सुविधा।। हमारे समक्ष जीवन में आती रहती हैं। विभिन्न समस्याएं सामान्य, जटिल तथा गूढ़। तब हम लोग हो जाते हैं किंकर्तव्यविमूढ।। हर पल,हर काल में,दिखते हैं दो रस्ते। एक बुरा मगर लुभावना तो दूजा भले के वास्ते।। और हमारे कदम चल पड़ते हैं उस तरफ। जहां होती है फिसलन तथा आकर्षण !
क्योंकि अच्छे रास्तों में होते हैं-विघ्न तथा चुभन !!
गलत रास्तों में मिलते हैं - व्यभिचार तथा भ्रष्टाचार !
जो हमें आनंद तथा लालच में , उलझाते रहते हैं लगातार !!
जबकि अंत में हमलोग दिन रात रोते और पछताते हैं !
और हम एक अटूट तथा अंधे गर्त में फंसते जाते हैं !!
सदमार्गों पर आरम्भ में तो मिलती हैं कठिनाईंयां !
किन्तु धीरे-धीरे मिलती हैं,सफलता की अनुपम ऊंचाईंयां !! *नरेन्द्रचावला*भारत*अमेरिका
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