परंतु श्रमिकों के जीवन उत्थान को भूलते जा रहे हैं।।
21वीं सदी में भी वे सर पर तसले व ईंटें उठाते हैं।
पत्र पत्रिकाओं में उनके लिए भाषण,कविताएं गाते हैं।। मजदूर आज भी सड़क किनारे दिहाड़ी को हैं ललचाते।
जबकि ठेकेदार तथा बिल्डर निरंतर धनी हैं होते जाते।।
बनाते हैं हमारे लिए महल,घर व मॉल सुंदर आलीशान।
पूरासाल कभीनहींजाता,स्वार्थी नेताओ का इनपर ध्यान।
न तो इनका कोई बीमा,शिक्षा का प्रबंध करता है।
यह मजदूर झोंपड़ी में पैदा और झोंपड़ी में ही मरता है।।
क्या कभी ये भी अमेरिकन मजदूरों जैसे कार में आयेंगे।
सपना ही होगा तब हम शान से श्रमिक दिवस मनाएंगे।।
*******नरेन्द्र चावला**वर्जीनिया**अमेरिका*******
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